हिंदुत्व का झंडा उठाकर समान नागरिक संहिता का विरोध आत्मघाती होगा

रवीन्द्र वाजपेयी – विधि आयोग द्वारा समान नागरिक संहिता पर विचार विमर्श की जो पहल की गई उसका कांग्रेस द्वारा विरोध किया जाना उसके मानसिक द्वंद का परिचायक है। एक तरफ तो वह सॉफ्ट हिंदुत्व का पाला छूकर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से छुटकारा चाहती है , वहीं दूसरी ओर मुसलमानों को खुश करने में भी लगी हुई है। कर्नाटक में वह भाजपा सरकार के बनाए धर्मांतरण विरोधी कानून को खत्म करने जा रही है जिसके कारण अनेक मुस्लिम जेल की हवा खाने मजबूर हुए। दूसरी तरफ वह हिंदू प्रतीक चिन्हों का उपयोग कर इस धारणा को ध्वस्त करना चाह रही है कि वह बहुसंख्यक विरोधी है । इस उहापोह में उसके अपने समर्थक भी असमंजस में हैं । समान नागरिक संहिता का मामला नया नहीं है। संविधान लागू होने के समय भी इसकी जरूरत महसूस की गई थी। ये भी कहा जाता है कि पंडित नेहरू और डॉ.अंबेडकर भी इस बात के पक्षधर थे कि सभी नागरिकों के लिए एक से कानून हों।

हालांकि जल्द ही हिंदू विवाह को लेकर बनाए कानून पर नेहरू जी और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए थे। कालांतर में ये विषय राजनीतिक झमेले में उलझकर ठंडा पड़ा रहा। हालांकि भाजपा और शिवसेना जैसे हिंदूवादी दल शुरू से ही मांग करते आ रहे थे कि नागरिक कानूनों के मामले में सभी धर्मों के लिए एकरूपता लाई जाए। बीते अनेक दशकों से राष्ट्रीय राजनीति में जिन मुद्दों पर तीखी बहस होती रही उनमें एक समान नागरिक संहिता भी है। तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद से ही इस कानून की मांग जोर पकड़ने लगी। भाजपा की राजनीति जिन मुख्य मुद्दों पर केंद्रित रही है उनमें राम मंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 खत्म करने जैसे वायदे तो उसने पूरे कर दिए। लेकिन समान नागरिक संहिता अभी भी लंबित है।

उल्लेखनीय है सर्वोच्च न्यायालय भी केंद्र सरकार से इस बारे में आगे बढ़ने कह चुका है। बीते कुछ वर्षों में असामान्य स्थितियां बनी रहीं इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी । लेकिन विधि आयोग की ताजा कोशिश के बाद चौंकाने वाली बात ये है कि सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर बढ़ रही कांग्रेस समान नागरिक संहिता लागू पर मोदी सरकार को घेरते हुए कह रही है कि वह अपनी विफलता पर परदा डालने के लिए ये पैंतरा लेकर आई है। अभी बाकी क्षेत्रीय दलों की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन उद्धव ठाकरे जैसे हिंदूवादी नेताओं के लिए इस कदम का विरोध करना कठिन होगा। निश्चित रूप से समान नागरिक संहिता का मुद्दा कांग्रेस के गले में हड्डी की तरह फंस सकता है।

यदि वह केंद्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले विधेयक का विरोध करती है तो उसका हिंदुत्व के प्रति रुझान नकली साबित हो जायेगा और वह समर्थन में खड़ी हुई तब मुसलमानों को वापस अपने साथ लाने की कोशिशों को पलीता लग जाएगा । कमोबेश पार्टी के समक्ष स्व.राजीव गांधी के शासनकाल में आए शाहबानो मामले जैसी स्थिति पैदा हो सकती है जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने की गलती कांग्रेस को बेहद महंगी साबित हुई थी। समान नागरिक संहिता कानून की समझाइश चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने दी है लिहाजा मोदी सरकार और भाजपा के पास आगे बढ़ने का समुचित आधार है। कांग्रेस को इस मुद्दे पर क्षणिक लाभ के बजाय दूरगामी दृष्टिकोण के साथ सोचना चाहिए। कर्नाटक की जीत निश्चित तौर पर उसके लिए उत्साहवर्धक है किंतु वहां जो समीकरण थे वे आगामी लोकसभा चुनाव में भी बने रहें ये जरूरी नहीं है ।

भाजपा समान नागरिक संहिता कानून के जरिए अपने एजेंडे को तो पूरा करेगी ही वह कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की छद्म धर्मनिरपेक्षता को भी उजागर करने का दांव चलेगी। राहुल गांधी सहित तमाम विपक्षी नेता आजकल हिंदुत्व का चोला ओढ़कर घूम रहे हैं। उनको ये समझ में आने लगा है कि देश की तीन चौथाई से ज्यादा जनसंख्या की उपेक्षा कर केवल अल्पसंख्यकों की मिजाजपुर्सी से अब काम नहीं चलेगा। इसीलिए अब कमलनाथ जैसे नेता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में पंडितों और पुजारियों को बुलाकर उनकी आवभगत करने लगे हैं । अरविंद केजरीवाल हनुमान चालीसा पढ़ने के साथ मुद्रा पर लक्ष्मी जी का चित्र छापने की वकालत कर रहे हैं । अखिलेश यादव ने परशुराम जी की प्रतिमा का अनावरण कर ब्राह्मण मतों की साधने की कोशिश की , वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी .राव भव्य हिंदू मंदिर बनवा रहे हैं ।

इस सबसे यही निष्कर्ष निकलता है कि भाजपा पर हिंदुत्व का उपयोग कर चुनाव जीतने का आरोप लगाने वाले नेताओं को भी अब उससे परहेज नहीं रहा। ये देखते हुए समान नागरिक संहिता पर कांग्रेस द्वारा प्रथम दृष्टया विरोध किए जाने से ये संकेत मिलता है कि वह अभी भी ढुलमुल रवैया अपना रही है । आने वाले समय में ये मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होगा । तब कांग्रेस इसके बारे में क्या नीति अपनाती है ये देखना दिलचस्प होगा क्योंकि हिंदुत्व का झंडा उठाकर समान नागरिक संहिता का आत्मघाती होगा।

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